गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

१ चावलकी खीर - भूमिका

 चावलकी खीर -- भूमिका (डायरी पन्ने १-६)
 -- निसर्गोपचार ब्लॉगपर तमाम फोटो कॉपी रखी गई हैं डिलीट करनेहेतु

    इस पुस्तककी बात कैसे चली ? यह तबकी बात है जब दूरदर्शनके सारे चॅनलोंमें सब चॅनेल अपने 'जरा हटके ' टाईप कार्यक्रमोंके लिए प्रसिद्ध हो चला था


    अखबारोंमे अक्सर ऐसा होता है कि व्यंजनोंको बनानेकी विधीके लिये भी सेलिब्रेटीका नाम लिया जाता है मसलन ऐश्वर्या रायका एक मॉक इन्टरव्यू लिखा जाएगा - कि हमने उनसे उनका पसंदीदा व्यंजन पूछा- उन्होंने कहा - ब्रेडके पकोडे फिर हमने पूछा - आप इसे कैसे बनाती हैं। उन्होंने अपनी विधी बताई लीजिए प्रस्तुत है पाठकोंके लिए ब्रेडके पकोडे बनानेकी वह विधी जिससे ऐश्वर्या राय ब्रेडके पकोडे बनाती है फिर एक विधी भी ऐश्वर्याके नाम फोटोके साथ छपेगी अब प्रश्न ये है कि यदि आपको ब्रेडके पकौडे पसंद हों तो क्या जरूरी है कि उसे बनाना भी आता हो? और आप बनाते भी हों -- खासकर जब आप सेलिब्रिटी भी हों?

    घरमें इसी तरहका लेख पढकर यह चर्चा हुई कि सब टीव्हीके लिए यह अच्छा विषय है वहाँ ऐसी खबरोंको व्यंगात्मक और प्रहसनपर स्क्रिप्टमें ढालकर पेश किया जाता है। सो मान लो सब टीव्हीने मेरा इन्टरव्यू किया तो वो कैसा होगा ?

    कोई  मुझसे पूछेगा - मॅडम आपकी पसंदीदा डिश क्या है?
    मैं भी गंभीर चेहरा बनाकर अपना राज बताऊँगी - गरम गरम भात पर घरका बना घी डालकर खाना - उसमें नमक, मिर्च, मसाला, दाल, सांभर कुछ भी हो।
    'हंमम। और बनाने की विधी ?'

    जब हमारे मॉक इन्टरव्यूकी स्क्रिप्ट यहाँ तक पहुँची तब मुझे खयाल आया कि बात केवल सादे चावल पकानेकी ही क्यों हो, इसके भी कई तरीके और कई टिप्स होते हैं। फिर यदि इससे आगे चलकर कुछ और बनाना हो तो उसके लिए तो सैकडों विधियाँ हैं। मॅगी या मॅकडोनाल्ड संस्कृतिमें तो एक ही जैसा स्वाद, चाहे दुनियाँमें कहीं जाओ, कभी भी खाओ। लेकिन भारतीय खानेकी मजा यही है कि इसे हमेशा नित नये तरीकेसे, नये स्वादके साथ बनाया जा सकता है। और इसमें हमारे मसाले बडी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन मसालोंकी सूक्ष्म मात्रा औषधियोंका भी काम करती है। 

कई बार आपको अच्छे लगनेवाले मसाले और व्यंजन एक दिशाको संकेत करते हैं कि आपके शरीरको क्या चाहिए - परंतु शर्त ये है कि आपको अपनी जिह्वाको इसके लिए सजग और ट्रेन करना पडता है ताकि वह आपके शरीरकी असली आवश्यकताका संकेत और संवेदना पकड सके

    स्वादकी व्हरायटीके लिए किये गये मेरे प्रयोग गिनानेसे पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं कोई सिद्धहस्त पाकशास्त्री नही हूँ उलटे मेरी गिनती उनमेंसे है जो अव्वल तो रसोईमें पैर नही रखती, और रखे भी तो वहाँसे जल्दी छुटकारा पानेका बहाना ढूँढती है हाँ, एक पाककला शिक्षकके रुपमें मेरा लोहा माना जाता है। मांसाहारी तो हूँ नही लेकिन शाकाहारी खानेके मामलेमें मेरी ट्रेनिंगका फायदा कई लोग आज भी लेते हैं और मेरे हाथके स्वादकी प्रशंसा भी करते हैं।

    इसी लिए उम्मीद है कि मेरे प्रयोग खासकर उन गृहिणियोंको अवश्य पसंद आयेंगे जिन्हें किचनके कामके साथ ऑफिस और बाहरकी जिम्मेदारियाँ भी निभानी पडती है

    महाराष्ट्रमें खानेका निवाला मुखमें डालनेसे पहले एक श्लोक पढा जाता है जिसका अर्थ है कि अन्नग्रहण केवल उदरभरण नही है, बल्कि एक यज्ञकर्म है। हर निवाला एक आहुति है जो पेटकी अग्निमें पडती है। वह आहुति प्रसन्न चित्तसे डाली जाये और सुस्वादु हो, इसके लिए आवश्यक है कि निवालेको अच्छी तरह चबाया जाय। यह करते हुए यदि हम जिह्वामें लगनेवाले स्वादके प्रति जागरुक रहें तो हमें विभिन्न स्वादोंका आनंद मिलता है। जैसे किसीकी अच्छी आँखे रंगोंकी सूक्ष्म छटाओंका फरक भी परख लेती हैं, उसी प्रकार जिह्वाको भी जब स्वादोंके सूक्ष्म भेद समझमें आने लागते हैं, तब वह आहार अधिक असरदार होता है। इन सूक्ष्म भेदोंकी पहचान जिह्वा कर सके इसलिए भी खानेमें विभिन्नता ला पाना आवश्यक है यह पुस्तक लिखनेकी प्रेरणा और मन्तव्य भी वही है।
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